कामिनी और दिव्या – अनोखी दास्ताँ (पार्ट 2)


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दिव्या को अपने कमरे में ना पाकर हम दोनों का बुरा हाल हो गया था। कामिनी तो बदहवासी में इधर उधर भाग रही थी, मैंने पहले उसे एक तरफ बैठाया, फिर मैं दिव्या को बाहर देखने निकल गया।

मैंने दिव्या को हर जगह तलाश किया लेकिन वो मिल ही नहीं रही थी, ना नीचे गली में, ना सीढ़ियों पर, ना ही नीचे और ऊपर वाले फ्लोर पर! पन्द्रह बीस मिनट तक खोजने पर भी नहीं मिली तो मेरे पैर कांपने लगे, मैं वहीं सीढ़ियों पर बैठ गया.

अचानक मेरे दिमाग में आया कि एक बार सबसे ऊपर छत पर भी देख लेता हूँ, क्या पता वहीं हो!
मैं लंबे लंबे कदमों से सीढियां चढ़ते हुए छत पर गया तो देखा कि दिव्या वहीं पानी की टंकी के पास बैठी थी, मैं दौड़ कर गया उसके पास, मुझे देखते ही वह खड़ी हो गई।
यह क्या … वह रो रही थी।

मैंने उससे पूछा- दिव्या, क्या हुआ, तुम यहां क्यूँ आ गई और रो क्यूँ रही हो?
उसने नाराजगी भरे लहजे में कुछ देर मेरी आँखों में देखा, फिर मुझसे पूछा- क्यों? आपको नहीं पता मैं क्यूँ रो रही हूं?

उसकी यह बात सुनकर मैं तुरन्त समझ गया कि निश्चित ही इसने मुझे और कामिनी को सेक्स करते हुए देख लिया है। मैंने उसके कंधे पर हाथ रखकर नीचे चलने को कहा, तो उसने बोला- यहां क्या समस्या है?
तो मैंने उसे समझाया कि जो भी बात करनी है नीचे चल कर करना, अभी तुरंत नीचे चलो, तुम्हारी माँ बहुत परेशान हो रही है।
मेरी यह बात सुनकर वह नीचे जाने लगी, मैं भी उसके पीछे पीछे चलने लगा।

फ्लैट में आकर मैंने दरवाजा बंद कर दिया, दिव्या को देखते ही उसकी माँ उठ खड़ी हुई और उसके पास जाकर एक जोरदार थप्पड़ दिव्या के गाल पर जड़ दिया, फिर साथ ही उसे जोर से अपने गले लगा लिया और दोनों रोने लगी।
माहौल गमगीन हो गया था और मैं भी बुत बना खड़ा था, माहौल को हल्का करने के लिए मैंने उन दोनों माँ बेटी से कहा- चलो यार, कोई मूवी देखने चलते हैं।
लेकिन वो दोनों ही कुछ नहीं बोली.

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तो मैंने उनके पास जाकर पूछा- क्या हुआ दिव्या? कुछ बोल क्यों नहीं रही हो?
दिव्या जैसे मेरे इसी प्रश्न का इंतजार ही कर रही थी, अपनी मां की ओर देखते हुए मुझे बोली- मैं जानती हूँ कि मेरी माँ एक औरत है, उसके शरीर की भी कुछ जरूरतें हैं. लेकिन आप दोनों को एक दूसरे के साथ देखा तो न जाने क्यूँ … मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ, इसलिए मैं ऊपर छत पर जा कर रोने लगी थी।

दिव्या अपनी माँ के हाथ को पकड़ते हुए बोलने लगी- मां, मैं इनसे से प्यार करने लगी हूँ, न जाने कब, ना जाने कैसे ये मुझे अच्छे लगने लगे हैं, मैं जानती हूं कि ये मुझसे 5-6 साल बड़े हैं, दिखने में भी कोई राजकुमार नहीं हैं लेकिन इनके पास सबसे अच्छा दिल है और मन ही मन इन्हें मैं अपना सब कुछ मान चुकी हूं।

यह सुनकर कामिनी अपनी बेटी को प्यार से देखकर उसके दाएं गाल पर हाथ रखते हुए बोली- बेटा, ये भी तुमसे बहुत प्यार करता है, यह पहले ही मुझे बता चुके हैं, हम दोनों ने जो कुछ भी किया वो बस भावनाओं का बहाव था, आगे से हम ऐसा कुछ नहीं करेंगे।

दिव्या मेरी और देखने लगी, मैंने सहमति में गर्दन हिला दी। यह सही वक्त था दिव्या से सब कुछ कह देने का, तो मैं रूम से सिदूंर ले आया और दिव्या के पास गया, तो दिव्या मेरी और प्रश्न भरी नजरों से देखने लगी, साथ ही दिव्या की माँ कामिनी भी आंखें फाड़ के देख रही थी।

मैं दिव्या का हाथ अपने हाथ में लेकर बोला- दिव्या, जिन हालातों में तुम लोग जीये, उन हालातों में जिंदा रहना बहुत मुश्किल था, लेकिन ऊपर वाले को हम लोगों को ऐसे ही हालात में मिलवाना था, तुम लोग भी जिंदगी की अहमियत जान चुके हो और मुझे भी तुम दोनों के रूप में जीने की वजह मिल चुकी है, तुम जैसी मासूम और सुंदर लड़की किसी की जिंदगी में आना किस्मत की बात है। दिव्या क्या तुम मुझे जिंदगी भर के अकेलेपन से बचाओगी जैसे तुमने मुझे उस तेंदुए से बचाया?

मेरी ये बातें सुनकर दिव्या की आंखों में खुशी के आंसू आ गए और वो मेरे गले लग गयी, मैंने भी उसे अपनी बांहों में ले लिया. कामिनी अपनी बेटी को मेरे से लिपटी हुई देख कर खुश हो रही थी. उसे पूरा भरोसा था मुझ पर कि मैं उसकी बेटी का पूरा पूरा ख्याल रखूँगा.
काफी देर तक दिव्या मेरे कंधे पर ठोड़ी रख कर रोती रही. मैंने भी उसे नहीं छेड़ा, मैंने सोचा कि रोकर इसका दिल हल्का हो जाएगा.

मेंने एक नजर कामिनी की ओर देखा तो पाया कि वो मेरी मन्शा समझ चुकी थी औऱ अपनी सहमति दे चुकी थी, लेकिन दिव्या अब भी अनजान थी।
इससे पहले कि दिव्या कुछ समझ पाती मैंने सिंदूर अंगूठे से उसकी मांग में रगड़ दिया।

हर्ष से दिव्या की आंखें बंद हो चुकी थी, साथ ही उसके चेहरे पर एक मुस्कान थी। मैंने उसे फिर से गले लगाया, तो वह मुझसे चिपक गयी, मैंने दिव्या की मम्मी कामिनी को भी हमारे पास आने के इशारा किया तो वह भी हम दोनों से लिपट गयी।
माहौल खुशनुमा हो चुका था, मैंने और दिव्या ने मूवी जाने का प्लान बनाया, हम चाहते थे कि कामिनी भी हमारे साथ चले लेकिन कामिनी ने ‘मेरा मन नहीं है, तुम दोनों चले जाओ!’ कह कर मना कर दिया.
उसने घर पर रुकने की सोची, साथ ही हम दोनों के लिए एक सरप्राइज भी तैयार रखने का बोली।

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